राजनीति में बने रहने की न्यूनतम योग्यता “बेशर्मी”

योग्यता, ईमानदारी, संवेदना और जवाबदेही

ये सब कभी राजनीति के प्रवेश द्वार पर पूछे जाते थे।

आज वहाँ केवल एक प्रश्न पूछा जाता है—

“आप कितने बेशर्म हैं?”

यदि जवाब संतोषजनक है,

तो टिकट, पद, मंच, सुरक्षा—सब उपलब्ध है।

यदि थोड़ी-सी भी शर्म बाकी है,

तो राजनीति आपके लिए नहीं है।

झूठ बोलना नहीं, झूठ पर टिके रहना कला है

आज का नेता झूठ बोलते समय डरता नहीं,

क्योंकि डर शर्म से आता है—

और शर्म अब राजनीति से निष्कासित की जा चुकी है।

नेता कहता है—

“महंगाई नियंत्रण में है”

और जनता बाजार में आँसू गिनती है।

नेता कहता है—

“युवाओं के लिए अवसर ही अवसर हैं”

और युवा अवसर ढूँढते-ढूँढते विदेश पहुँच जाता है।

नेता जानता है— जनता सब समझ रही है।

जनता जानती है— नेता झूठ बोल रहा है।

फिर भी यह संवाद चलता रहता है।

क्योंकि लोकतंत्र अब संवाद नहीं, नाटक है।

इस्तीफा : अब एक आपत्तिजनक शब्द

आज के नेता के शब्दकोश में

“इस्तीफा” वही स्थान रखता है

जो संविधान में “नैतिकता” का।

पुल गिर जाए—

“तकनीकी कारण थे”

सड़क धँस जाए—

“जांच बैठा दी”

पेपर लीक हो जाए—

“पूर्व सरकार जिम्मेदार”

लोग मर जाएँ—

“दुर्भाग्यपूर्ण”

लेकिन मंत्री कुर्सी से न गिरे—

यह अनिवार्य है।

इस्तीफा देना आज

राजनीतिक आत्महत्या समझा जाता है,

और बेशर्मी

राजनीतिक दीर्घायु का अमृत।

सत्ता में रहकर रोना एक लोकप्रिय कला

आज का नेता

सत्ता में रहकर

सबसे अधिक पीड़ित होता है।

वह कहता है—

“अधिकारी मेरी नहीं सुनते”

यह बयान सुनकर

संविधान शायद सिर पकड़कर बैठ जाता होगा।

क्योंकि यह वही नेता होता है— जो अधिकारियों की पोस्टिंग करता है,

ट्रांसफर करता है,

प्रमोशन रोकता है।

लेकिन जब काम न हो— तो नेता असहाय,

और अधिकारी स्वतंत्र घोषित कर दिए जाते हैं।

इसे कहते हैं— जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की बेशर्म कला।

विपक्ष : आईना नहीं, रिहर्सल

विपक्ष सत्ता में रहते हुए जो करता है,

उसे सत्ता से बाहर आकर

“तानाशाही” कहता है।

EVM— हार में खराब,

जीत में लोकतांत्रिक।

भ्रष्टाचार— दूसरे करें तो घोटाला,

खुद करें तो राजनीतिक षड्यंत्र।

नैतिकता— केवल चुनावी पोस्टर तक सीमित।

यह विरोध नहीं,

भविष्य की रिहर्सल है।

संविधान : मंच की सजावट

संविधान अब

शपथ समारोह और भाषणों की सजावट है।

उठाया जाता है— तस्वीर के लिए।

रखा जाता है— चुनाव के लिए।

भुला दिया जाता है— शासन के समय।

और जब सवाल आए— तो जवाब तैयार है—

“जनता ने हमें चुना है”

मानो चुनाव

न्यायालय भी है,

जमानत भी,

और चरित्र प्रमाण-पत्र भी।

जनता : सबसे ईमानदार, सबसे मजबूर

जनता मूर्ख नहीं है।

वह सब देखती है।

लेकिन उसके सामने विकल्प होते हैं—

ज्यादा बेशर्म

उससे थोड़ा कम बेशर्म

वह कम बेशर्म को चुन लेती है,

और इसे लोकतंत्र कहा जाता है।

निष्कर्ष : बेशर्मी, लोकतंत्र का स्थायी भाव

आज की राजनीति में—

शर्म कमजोरी है

सवाल देशद्रोह है

जवाबदेही बोझ है

लेकिन बेशर्मी सबसे बड़ी योग्यता है।

जो नेता

आँखों में आँख डालकर झूठ बोल सके,

विफलता को उपलब्धि बता सके,

और हर सवाल पर मुस्कुरा सके—

वही आज का

दीर्घकालीन, सुरक्षित और सम्मानित जनप्रतिनिधि है।

बाकी सब

लोकतंत्र के इतिहास में

फुटनोट बनकर रह जाते हैं।

(लेखक )

  • एडवोकेट चंचल गुप्ता

 

Leave a Comment