कानूनी दृष्टिकोण से यूजीसी मसले का पूरा विश्लेषण
- एडवोकेट चंचल गुप्ता
उच्च शिक्षा में सुधार की आवश्यकता पर शायद ही कोई मतभेद हो। लेकिन इसमें काेई दाे मत नहीं है कि विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, नियुक्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही आज की सबसे बड़ी जरूरतें हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रस्तावित नए ड्राफ्ट नियम इसी दिशा में उठाया गया कदम हैं।
लेकिन इन नियमों को लेकर उठता विवाद बताता है कि मामला केवल शिक्षा सुधार का नहीं, बल्कि संविधान, संघीय ढांचे और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा है।
सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि विवाद इस बात पर नहीं है कि UGC मानक तय करे या नहीं। असली सवाल यह है कि मानक तय करने की सीमा कहां समाप्त होती है और प्रशासनिक नियंत्रण कहां से शुरू हो जाता है।
संविधान के अनुसार शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, यानी केंद्र और राज्य—दोनों की भूमिका तय है। सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में साफ कह चुका है कि UGC जैसे केंद्रीय निकाय न्यूनतम शैक्षणिक मानक तय कर सकते हैं, लेकिन विश्वविद्यालयों का संचालन और प्रशासन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। कुलपति नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उठा विवाद इसी संवैधानिक सीमा से जुड़ा है, जहां राज्यों की भूमिका कमजोर होती दिखाई देती है।
UGC के ड्राफ्ट नियमों के साथ सामाजिक स्तर पर भी असंतोष सामने आया है। एक वर्ग में यह भावना बनी है कि सवर्णों के हितों की अनदेखी हो रही है,
कुछ वर्गों को अत्यधिक संरक्षण दिया जा रहा है, और झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कार्रवाई के स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। यहां भ्रम और तथ्य को अलग करना जरूरी है। तथ्य यह है कि ड्राफ्ट नियमों में किसी भी वर्ग के संवैधानिक अधिकार समाप्त करने का कोई प्रावधान नहीं है। न आरक्षण खत्म किया गया है और न ही उसका असंवैधानिक विस्तार किया गया है। इसलिए यह कहना कि ये नियम सवर्ण वर्ग को कानूनी रूप से नुकसान पहुंचाते हैं, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ड्राफ्ट में शिकायत-तंत्र और इक्विटी सेल पर विशेष जोर है, जबकि झूठी, दुर्भावनापूर्ण या दुरुपयोग वाली शिकायतों से निपटने की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि झूठी शिकायत भी न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग है और इससे निर्दोष व्यक्ति के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं। ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं शिकायत-तंत्र एकतरफा संरक्षण का माध्यम न बन जाए। यदि सरकार और UGC चाहते हैं कि ये नियम कानूनी रूप से मजबूत और सामाजिक रूप से स्वीकार्य बनें, तो कुछ सुधार जरूरी हैं। कुलपति नियुक्ति और प्रशासनिक निर्णयों में राज्य सरकार की भूमिका को स्पष्ट और विधिक रूप से सुनिश्चित किया जाए। UGC के अधिकारों को साफ तौर पर न्यूनतम शैक्षणिक मानकों तक सीमित रखा जाए। शिकायत-तंत्र में झूठी शिकायतों पर निष्पक्ष जांच और कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान जोड़ा जाए। और सबसे अहम, सभी वर्गों को यह भरोसा दिया जाए कि समान अवसर का अर्थ पक्षपात नहीं, बल्कि निष्पक्ष न्याय है।
UGC के नए नियम शिक्षा सुधार का अवसर हैं, टकराव का कारण नहीं। लेकिन सुधार तभी सफल होगा, जब वह संविधान की मर्यादा, संघीय संतुलन और सामाजिक विश्वास—तीनों के साथ चले। कानून आदेश से लागू हो सकता है, पर स्वीकार तभी होता है, जब उसमें हर वर्ग को न्याय का भरोसा हो।

एडवाेकेट चंचल गुप्ता