जहां “बिजनेस पार्टनर” है भगवान 

  • विश्व प्रसिद्ध मंदिर बना आस्था और “व्यापार” का संगम 
  • भगवान श्रीकृष्ण और भक्तों के बीच है आस्था के साथ “पार्टनरशिप” का रिश्ता 

हमारे देश में कई ऐसे मंदिर है जहां भगवान की पूजा राजा, पिता, मित्र और अन्य रूपों में होती है लेकिन एक ऐसा मंदिर भी है जहां भगवान को “बिजनेस पार्टनर” के रूप में पूजा जाता है। यह दरबार इन दिनों न केवल अपनी भव्यता, बल्कि भक्तों और भगवान के बीच के एक अनोखे रिश्ते के लिए पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यह एक “कॉर्पोरेट हब” के रूप में पहचान बना रहा है जहां देश-दुनिया के बड़े कारोबारी भगवान को अपना “बिजनेस पार्टनर” मानते हैं।

यह मान्यता सिर्फ पूजा करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि भगवान को अपने प्रॉफिट का हिस्सा देने तक चलन में है। भक्त अपने बिजनेस से होने वाली कमाई का एक निश्चित हिस्सा भगवान के दान पत्र में यह मानकर अर्पित कर जाते हैं कि यह एक “पार्टनरशिप” है। देशभर के व्यापारी, उद्योगपति और कारोबारी यहां अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान स्वरूप चढ़ाते हैं। मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से सांवलिया जी को अपना भागीदार मानता है, उसके व्यापार में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होती है।

इसलिए कहलाते हैं “सांवलिया सेठ”

सांवलिया जी को “सांवलिया सेठ” इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे भक्तों के आर्थिक संकट दूर करने वाले साहूकार माने जाते हैं। अफीम की खेती करने वाले किसानों से लेकर, लहसुन के कारोबारियों और मुंबई-दिल्ली के बड़े हीरा व्यापारियों तक, सबने भगवान के साथ ‘साझेदारी’ कर रखी है। व्यापारी अपने बिजनेस के कागजात भगवान के चरणों में रखते हैं और उन्हें अपना हिस्सा देने का संकल्प लेते हैं। लोगों का अटूट विश्वास है कि भगवान को पार्टनर बनाने के बाद उनका घाटा मुनाफे में बदल जाता है। इसी आस्था के चलते आज यह मंदिर राजस्थान के सबसे धनी मंदिरों की श्रेणी में शामिल है।

भूमि से प्रकट हुए थे सांवले सरकार

सांवलिया जी मंदिर का इतिहास करीब 450 वर्ष पुराना और चमत्कारी माना जाता है। लोक कथाओं के अनुसार, वर्ष 1841 में मंडफिया ग्राम के निवासी दयाराम गुर्जर को एक सपना आया था। सपने में उन्हें बताया गया कि बागुंड-भादसोड़ा की सीमा पर छापर नामक स्थान पर भूमि में तीन मूर्तियां दबी हुई हैं। जब खुदाई की गई, तो वहां से भगवान कृष्ण की अत्यंत सुंदर तीन मूर्तियां निकलीं।

  1. सबसे बड़ी मूर्ति को मंडफिया लाया गया, जहाँ आज भव्य मुख्य मंदिर स्थित है।
  2. मध्यम मूर्ति को भदसोड़ा में स्थापित किया गया (जिसे प्राचीन सांवलिया जी मंदिर कहा जाता है)।
  3. सबसे छोटी मूर्ति विश्राम घाट (छापर) पर स्थापित की गई, जहाँ वे प्रकट हुई थीं।

ये मूर्तियां वही बताई जाती हैं जिनकी पूजा मीराबाई किया करती थीं और कालांतर में मुगल आक्रमणों के दौरान इन्हें जमीन में सुरक्षित छिपा दिया गया था। कुछ किवदंतियां, मूर्तियों के अन्यत्र पानी या कुएं से मिलने से भी जुड़ी हुई हैं। 

लेन-देन की पहली एंट्री सांवलिया सेठ के नाम से 

सांवलिया सेठ को श्रीकृष्ण का व्यापारी रूप माना जाता है। यहां हर दिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन विशेष रूप से पूर्णिमा, एकादशी और जन्माष्टमी पर मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है। भक्त जन यहां आकर न केवल पूजा-अर्चना करते हैं, बल्कि अपने व्यापारिक खातों की शुरुआत भी यहीं से करते हैं। कई व्यापारी तो अपने लेन-देन की पहली एंट्री सांवलिया सेठ के नाम से करते हैं।

10% से 50% तक कमाई सांवलिया सेठ की

इस मंदिर में चढ़ाए जाने वाले दान की बात करें तो यह किसी भी बड़े धार्मिक स्थल से कम नहीं है। कहा जाता है कि यहाँ आने वाले भक्त अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा (10% से 50% तक) सांवलिया सेठ के नाम करते हैं। जब उनका व्यापार फलता-फूलता है, तो वे उस मुनाफे को भगवान के चरणों में अर्पित कर देते हैं। यही कारण है कि इस मंदिर का दानपात्र जब खुलता है, तो नोटों की गिनती में कई दिन लग जाते हैं। श्रद्धालु यहां सोना, चांदी, नकद राशि, और कीमती वस्तुएं चढ़ाते हैं। मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, हर साल करोड़ों रुपए का दान प्राप्त होता है। कई भक्त तो अपने व्यापार का एक निश्चित प्रतिशत नियमित रूप से मंदिर को अर्पित करते हैं। मंदिर में एक विशेष दान पेटी है जिसे “बिजनेस पार्टनर दान पात्र” कहा जाता है, जहां व्यापारी अपनी आय का हिस्सा डालते हैं।

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दान इतना कि गिनने में कई दिन लगते है 

मंदिर मंडल द्वारा हर माह चतुर्दशी को दानपात्र खोला जाता है। हर महीने भंडार से औसतन 8 से 15 करोड़ रुपए की नकदी निकलती है। त्योहारों के सीजन में यह आंकड़ा 20 करोड़ को पार कर जाता है। भक्त यहाँ गुप्त दान के रूप में सोने के बिस्किट, मुकुट और चांदी की सिल्लियां चढ़ाते हैं। कई बार भंडार से किलो की मात्रा में सोना और क्विंटल में चांदी प्राप्त होती है। यहाँ केवल भारतीय रुपया ही नहीं, बल्कि डॉलर, पाउंड और यूरो जैसी विदेशी मुद्राएं भी बड़ी मात्रा में निकलती हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि सांवलिया सेठ के “बिजनेस पार्टनर” विदेशों में भी बैठे हैं।

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मंदिर प्रबंधन और पारदर्शिता

सांवलिया सेठ मंदिर का संचालन एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है, जो दान की राशि का उपयोग सामाजिक कार्यों में करता है। इसमें अस्पताल, स्कूल, गौशाला और गरीबों की सहायता जैसे कार्य शामिल हैं। मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरे, डिजिटल दान प्रणाली और ऑनलाइन दर्शन की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है। मंदिर न केवल धार्मिक केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। मंदिर के कारण आसपास के गांवों में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। होटल, दुकानें, परिवहन सेवाएं और हस्तशिल्प उद्योग को भी इससे लाभ हुआ है।  सांवलिया सेठ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, व्यापार और सामाजिक सेवा का संगम है। यहां भगवान को ‘बिजनेस पार्टनर’ मानने की परंपरा ने एक नई सोच को जन्म दिया है’ 

खुशियों का श्रेय अपने “सेठ”  को 

मुख्य मंदिर की वास्तुकला अक्षरधाम मंदिर की याद दिलाती है। गुलाबी पत्थरों से बना यह मंदिर अपनी नक्काशी और भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के गर्भगृह में विराजे भगवान कृष्ण की सांवली सूरत के दर्शन मात्र से भक्तों की थकान मिट जाती है। जलझूलनी एकादशी पर यहां आयोजित होने वाला ‘मेला’ राजस्थान के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। सांवलिया सेठ का दरबार श्रद्धा और समृद्धि का वह अद्भुत संगम है, जहाँ एक भक्त केवल याचक बनकर नहीं, बल्कि एक “हिस्सेदार” बनकर आता है और अपनी खुशियों का श्रेय अपने “सेठ” (भगवान) को देता है। 

(मंदिर और मान्यताओं सम्बन्धी तथ्य आस्था और प्रचलित जानकारी के आधार पर दिए गए हैं। यह खबर स्पष्ट पुष्टि और प्रमाण नहीं है। )

 

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