– कई शोध और अध्ययन में पाया गया कि प्रकृति से जुड़े रहना बेहतर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी
प्रकृति के साथ कुछ पल बिताना सिर्फ ‘टाइम पास’ या ‘खाली समय में घूमना’ नहीं है। बल्कि यह खुद को रिचार्ज करने और बूस्टर डोज लगाने जैसा है जो हमें लंबे समय तक स्वस्थ और सक्रिय रखने में मदद करता है। इससे हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अनगिनत फायदे मिलते हैं। आपाधापी भरी जिंदगी में जहां हम डिजिटल स्क्रीन में कैद होकर रह गए हैं, तनाव और दबाव को कम करने के लिए प्रकृति एक वरदान साबित होती है। जरूरत है उसकी गोद में कुछ समय बिताने की . . .

तनाव और चिंता से राहत
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की रिपोर्ट कहती है कि हरे-भरे वातावरण में 20 मिनट बिताने पर कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर में 15 प्रतिशत तक की कमी आती है। जबकि जापान के रिसर्च में पाया गया कि पेड़ों की बीच टहलने पर ब्लड प्रेशर और हृदयगति सामान्य होती है। अमेरिकल साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार जो लोग प्राकृतिक स्थलों पर जाते हैं उनमें एंग्जाइटी डिसऑर्डर का खतरा 25 प्रतिशत तक कम होता है। पेड़ों की सरसराहट, पक्षियों का चहकना और बहते पानी की आवाज सुनना मन को शांत करता है और हमें तुरंत सुकून का एहसास होता है।
हर पल मानसिक स्वास्थ्य में सुधार
प्राकृतिक वातावरण में रहने पर शरीर में सेरोटोनिन और एंडोर्फिन जैसे ‘खुशी हार्मोन’ का स्तर बढ़ता है। जिससे हम अधिक खुश, सकारात्मक और ऊर्जावान महसूस करते हैं, साथ ही अवसाद जैसी समस्याओं का जोखिम कम होता है। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के 2019 के अध्ययन में पाया गया कि जो लोग सप्ताह में कम से कम 120 मिनट प्रकृति के बीच रहते हैं, वो संतुष्ट और मानसिक रूप से स्वस्थ महसूस करते हैं। प्राकृतिक आवाजें मस्तिष्क की प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को शांत करती हैं जिससे डिप्रेशन कम होता है।

एकाग्रता बढ़ाने में मददगार
दिमागी शक्ति और एकाग्रता बढ़ाने के लिए प्रकृति का साथ अचूक हथियार है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक प्रयोग में कुछ प्रतिभागियों को दो वर्गों में बांटा गया। कुछ को प्राकृतिक वातावरण में जबकि कुछ को शहरी सड़कों पर चलाया गया। जिन्हें प्राकृत्रित स्थान चलाया गया उनकी एकाग्रता और रचनात्मकता 50 प्रतिशत ज्यादा पाई गई। यही बात मिशिगन यूनिवर्सिटी की रिसर्च में भी साबित हुई कि प्रकृति के दृश्यों को कुछ देर देखने या प्राकृतिक जगह पर टहलने से एकाग्रता शक्ति में सुधार होता है।
नींद की गुणवत्ता में सुधार
2020 में यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉयस के शोधकर्ताओं ने यह पाया कि प्राकृतिक ध्वनियों जैसे बारिश की आवाज, झरनों, पत्तों की सरसराहट आदि से मस्तिष्क की अल्फा तरंगें सक्रिय होती हैं जो नींद की स्थिरता को बढ़ाती है। प्राकृतिक प्रकाश में समय बिताने से हमारे शरीर की सोने और जागने का प्राकृतिक चक्र बेहतर ढंग से नियंत्रित होता है। शाम होने के साथ दिमाग मेलाटोनिन नामक हार्मोन का सही स्तर जारी करता है, जो रात में गहरी और अच्छी नींद लेने में मदद करता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि
हरे-भरे इलाकों में सांस लेने से हमें फाइटोसाइड्स जैसे प्राकृतिक रसायन मिलते हैं। ये हमारे शरीर में व्हाइट ब्लड सेल्स के उत्पादन को बढ़ाते हैं, जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और हम बीमारियों से लड़ने में सक्षम होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2022 की रिपोर्ट भी कहती है कि प्राकृतिक स्थानों के समीप रहने वाले लोगों में मोटापा, डायबिटीज जैसी घातक बीमारियों का खतरा 20 से 25 प्रतिशत तक कम होता है। कम्प्यूटर, स्मार्टफोन की बजाय जब हम प्राकृतिक हरियाली को देखते हैं तो आंखों को आराम मिलता है और दृष्टि बेहतर होती है। प्राकृतिक रूप से हल्की धूप में रहने से विटामिन डी मिलता है जो हडि्डयों को मजबूत बनाता है।
डिजिटल डिटॉक्स और सामाजिक जुड़ाव
युनिवर्सिटी ऑफ स्टैनफोर्ड और कैलिफोर्निया की 2022 की एक रिपोर्ट बताती है कि प्रकृति के साथ समय बिताना डिजिटल डिटॉक्स में सहायक होता है। लगातार कम्प्यूटर और स्मार्ट फोन पर काम करने, देखने के कारण हमारा स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो सकता है, जिससे निजात पाने के लिए प्रकृति सहायक हो सकती है। ऑस्ट्रेलिया की एक युनिवर्सिटी की रिपोर्ट के मुताबिक जो लोग हर रोज एक घंटा प्रकृति के साथ बिताते हैं उनमें सामाजिक जुड़ाव यानी सोशल बॉडिंग पैदा होती है और वे अन्य लोगों के प्रति ज्यादा मिलससार और सहृदय होते हैं, जिससे जीवन में प्रसन्नता आती है।

आत्मसंतोष का माध्यम
दौड़ भाग से हटकर जब हम प्रकृति के बीच कुछ समय एकांत में बिताते हैं तो हमें खुद से जुड़ने, आत्म-चिंतन करने और अपने आसपास की दुनिया से जुड़ाव महसूस करने का मौका मिलता है। यह आंतरिक शांति और संतोष की भावना प्रदान करता है, जिससे हम हर वर्तमान पल का आनंद ले पाते हैं और जीवन को अधिक सार्थक मानते हैं।