– किसी भी कार्य के बारे में जरूरत से ज्यादा सोचना “पैरालिसिस बाय एनालिसिस” के संकेत
– जब आप आवश्यकता से अधिक जानकारी जुटाने लगें तो मान लें कि आप भी शिकार हो चुके हैं
हममें से कई लोग “पैरालिसिस बाय एनालिसिस” नामक समस्या का शिकार हैं, लेकिन खास बात यह है कि हमें इसके बारे में पता ही नहीं है। आइए जानते हैं इसके बारे में . . . जो जीवन में बहुत बड़ी असफलताओं का कारण बन सकती है। अगर आप इसे समय पर नहीं पहचान पाए, तो यह खुद के साथ और परिवार के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा।
किसी भी काम को करने से पहले उसके सभी पक्षों और बिंदुओं पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए, यह सही है। लेकिन इतना भी विचार नहीं करना चाहिए कि हम उस काम को कर ही नहीं पाएं। यही स्थिति “पैरालिसिस बाय एनालिसिस” कहलाती है।
अमेरिका और जापान के विशेषज्ञों ने यह साबित किया कि कई लोग शर्ट खरीदने और रेस्टोरेंट में खाना खाने जैसे विषयों पर जरूरत से ज्यादा रिसर्च करते हैं, इतना रिसर्च की वह काम ही टल जाता है या उसे करने का उत्साह ही खत्म हो जाता है। कभी- कभार यह सामान्य हो सकता है लेकिन लगातार इतना विचार करना मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए खतरनाक है और व्यावहारिक और आर्थिक रूप से भी परेशानी का कारण बन सकता है
जानकारी की अति और अभाव दोनों ही घातक
शोध बताते हैं कि “पैरालिसिस बाय एनालिसिस” अधिकतर दो स्थिति में पैदा होता है, पहला जानकारी की अति दौर दूसरा जानकारी का अभाव। जब हमारे पास ज्यादा जानकारी होती है और हम सभी विकल्पों पर विचार करते हैं तो भी संकोच की स्थिति होती है और हम निर्णय ही नहीं ले पाते। जबकि अगर हमारे पास किसी भी कार्य, उत्पाद या प्रक्रिया की बिल्कुल जानकारी नहीं होती तो भी हम उसके बारे में जानने की कोशिश करते हैं और देरी के कारण निर्णय नहीं ले पाते। इसलिए जरूरी है कि किसी भी कार्य या प्रोडक्ट के बारे में पर्याप्त जानकारी रखें। ज्यादा जानकारी जुटाने की चाह आपकी उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करती है।
परफेक्शन की चाह
किसी भी कार्य को करने में परफेक्शन की चाह “पैरालिसिस बाय एनालिसिस” का सबसे बड़ा कारण होती है। किसी भी कार्य को बेहतर तरीके से करने की चाह बुरी नहीं होती, लेकिन याद रखिए बेहतरीन के चक्कर में बेहतर चीजें हाथ से छूट जाती हैं। हमेशा हर गेंद पर छक्का नहीं लगता, उसी तरह हर काम हर बार सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता। अगर आप हर कार्य को हर बार परफेक्ट करने की चाह रखेंगे तो “पैरालिसिस बाय एनालिसिस” का शिकार होना स्वाभाविक है।
पेशे का इस विकार से संबंध
“पैरालिसिस बाय एनालिसिस” का आपके पेशे से गहरा संबंध हो सकता है। अगर आप ऐसे पेशे में हैं जिसमें कल्पना करने से लेकर योजना बनाने, निर्माण या सेल करने और सर्विस देने तक यानी उसके निष्कर्ष तक काफी सोचना पड़ता है तो आपको कई पक्षों पर बार-बार विचार करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि आपमें ज्यादा सोचने की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है और आप इसे अपने निजी जीवन के समीकरणों से अलग नहीं रख पाने की स्थिति में ‘पैरालिसिस बाय एनालिसिस” के शिकार हो सकते हैं।
पारिवारिक, आर्थिक और अन्य स्थितियों से संबंध
“पैरालिसिस बाय एनालिसिस” कई कारणों के चलते हो सकता है। अगर आपके परिवार की स्थितियां ज्यादा अनुकूल नहीं है, वैचारिक टकराहट है या फिर आप पर ज्यादा जिम्मेदारियां हैं तो भी आप ज्यादा विकल्पों पर विचार करेंगे और निर्णय नहीं ले पाएंगे। कुछ मामलों में आपकी आर्थिक स्थिति भी ज्यादा विचार करने का कारण हो सकती है। अगर आपके पास पर्याप्त पैसा है तो आप किसी भी कार्य में ज्यादा विचार नहीं करेंगे। कोई सामान खरीदना हो या घूमने जाना हो या फिर कोई इवेंट करना हो। कोई भी विकल्प चुनने में आपको झीझक नहीं होगी। लेकिन अगर आपके पास पैसा कम है, तो आप सोचेंगे कि ऐसी जगह घूमने चलें जो अपेक्षाकृत सस्ता हो, ऐसी खरीदी करें जो कम खर्चीली हो या फिर ऐसा कार्यक्रम रखें जो अपने बजट में पूरा हो जाए। इस तरह आप कम खर्च की चाह में ज्यादा विचार करते हैं और उसका असर काम की गुणवत्ता और परिणामों पर होता है। इसी तरह अगर आपके आसपास का माहौल, आपकी टीम, दोस्त और साथी जिम्मेदार नहीं है या फिर आपका साथ नहीं देते तो भी आप ज्यादा विचार करने की आदत का शिकार हो सकते हैं।
कैसे पहचानें कि आप “पैरालिसिस बाय एनालिसिस” का शिकार हो चुके हैं
– जब आप किसी भी कार्य को करने या न करने के बारे में ज्यादा सोचने लगते हैं।
– जब आप कार्य को शुरू करने में झिझकते हैं।
– जब आप कार्य की पूरी रूपरेखा बनाने की बजाय टालते हैं।
– जब आप पर्याप्त जानकारी हासिल करने के बाद भी ज्यादा रिसर्च करने पर अड़े रहते हैं।
– जब आप एक ही बिंदु पर टिक जाते हैं।
– जब आप ‘कुछ और बेहतर” की मानसिकता रखते हैं।
– जब आप इसके कारण लगातार तनाव में रहते हैं।
– काम शुरू करने की बजाय टालते रहते हैं।
– जब आप बार-बार विकल्प बदलने पर विचार करते हैं।
– जब आप विकल्पों में छोटा सा अंतर मिलने पर भी बड़ा रिएक्ट करते हैं।
– जब आप हर परिणाम के प्रति असंतुष्ट रहते हैं।
बचने के बेहद आसान उपाय
– सबसे पहले यह स्वीकार करें कि दुनिया में कोई भी परफेक्ट नहीं होता। अपनी संतुष्टि का स्तर तय करें।
– कार्य को शुरू करने और पूरा करने की समय सीमा निर्धारित करें।
– गलतियों से या असफलताओं से डरने की बजाय प्रयास करने में विश्वास रखें।
– काम करेंगे तो चूक भी होगी। इसे स्वीकार करें और आगे बढ़ें।
– आवश्यकता से अधिक जानकारी जुटाने की आदत को नियंत्रित करें, कोशिश यह करें कि पर्याप्त जानकारी जुटाने के बाद काम शुरू कर दें।
– बार-बार परिणाम को सोचकर विकल्पों की अदला-बदली न करें। जिस योजना का निर्णय लिया है, उसी को बेहतर तरीके से पूरा करने की कोशिश करें।
– कोई भी प्रयास करने से पहले उसके शून्य परिणाम को ध्यान में रखें कि ज्यादा से ज्यादा खराब भी होगा तो भी आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा।
– याद रखें कोई भी सफलता सिर्फ एक कार्य से नहीं मिलती, बल्कि यह लगातार प्रयासों की एक प्रक्रिया है। एक कार्य अगर कम बेहतर भी हुआ तो अगले अवसर फिर भी जीवित रहेंगे। इसलिए लगातार बेहतर प्रयास करने में विश्वास रखें और अपना बेस्ट देने की कोशिश करें।