चिताएं ठंडी भी नहीं हुई उन मृतकों की, जिन्होंने भागीरथपुरा में नगर निगम का जहरीला पानी पीकर मौत के मुंह में चले गए। 24 मौतों के बाद अब भी वहां की गलियों में चीख पुकार, चित्कार और सिसकियां गूंज रही हैं और “सुशासन” का रोना रोने वाली सरकार ने “सियासी एडजस्टमेंट” शुरू कर दिया है। डिमोशन के नाम पर प्रमोशन कर दिया और वो भी उन्हीं अधिकारियों का, जिनके सिर पर पूरे कांड का ठिकरा फोड़ा गया था। इसी कारण कहा जाता है कि “एमपी गजब है . . . वाकई में सबसे गजब है . . .।”
भ्रष्टाचार, स्वार्थ, श्रेय की राजनीति, भाई-भतीजावाद के मामले में विपक्ष के आरोपों से घिरी सरकार अब आम लोगों की निगाहों में भी किरकिरी बन रही है। इसकी एक बानगी सोशल मीडिया पर शोर मचा रही है। भागीरथपुरा कांड के लिए सरकार को दोषी मान चुकी जनता का गुस्सा उफनकर बाहर तब आ गया जब सवालों के जवाब देने की जगह “घंटा” थमा दिया गया, जवान मौतों पर मुआवजे का मलहम लगाने का नाटक किया गया, दोषियों को हटाने की नौटंकी शुरू हुई और जब इन्हीं दोषियों को दूसरे विभागों को चमकाने का ताज पहना दिया गया।
सबसे बड़ा उदाहरण तत्कालीन निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव का है, जिन्हें खुद सरकार ने यह कहकर हटाया था कि “उनकी जिम्मेदारी है”। इन्हीं सज्जन को मोहन की “मनमोहक” सरकार ने पर्यटन विभाग के एमडी यानी मैनेजिंग डायरेक्यर यानी सबसे बड़े प्रशासनिक पद से नवाजा है। किसी भी स्तर पर यह सजा या डिमोशन तो नहीं है। इसे प्रमोशन ही माना जाएगा।
इंदौर की छवि बिगाड़ने वाले सबसे बड़े दाग के दागदार को इस तरह का ताज पहनाना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। जैसे कि पहले अच्छे अधिकारी को गलत मानकर, जिम्मेदार ठहराकर सजा दे दी गई और अब डेमेज कंट्रोल लिया जा रहा है या फिर पहले जिसने गलती (लापरवाही या अपराध) की, उसी को फिर से बड़ी जिम्मेदारी देकर “अफसरशाही” को “सेट” किया जा रहा है। या तो पहले अधिकारी सही था और कार्रवाई गलत, या फिर अब भी गलत अधिकारी को ही “तोका” जा रहा है।
कुलजमा प्रशासनिक व्यवस्थाओं, जिम्मेदारियों और भरोसे की धज्जियां उड़ रही हैं और सरकार, नेता, जन प्रतिनिधि अपनी ही पीठ थपथपाने में लगे हुए हैं।
यादव को पर्यटन एमडी बनाए जाने की खबरों के साथ ही तमाम सोशल मीडिया इस ताजपोशी की आलोचना में उमड़ पड़ा, क्योंकि यह बेहद गंभीर मामला है और इसे हल्के में कतई नहीं लिया जा सकता। प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक नियुक्तियों के बीच का कडा अंतर्विरोध स्पष्ट नजर आ रहा है। जिस अधिकारी को आरोपी मानकर हटाया गया, उन्हीं के सियासी सेटलमेंट ने खुद सत्ताधारी दल में असंतोष पैदा कर दिया है।
लोगों में यह संदेश साफ तौर पर नाराजी बनकर उभरा कि “सुशासन के स्वांग वाली सरकार में अपनों की सुरक्षित लैंडिंग के लिए मखमली कालीन बिछा हुआ है।” सोशल मीडिया पर ये सवाल भी छाए रहे हैं कि सरकार के पास पर्यटन विभाग की तरह कई ऐसे विभाग और कई ऐसे मुकाम है जहां दागी अधिकारियों, नेताओं और जनप्रतिनिधियों को “रिफ्रेश” किया जा सकता है. . . यानी दाग धोने के लिए वॉशिंग मशीन कई हैं . . . ।
निश्चित रूप से इन आरोपों से परे सवाल कई हैं जो नेताओं में अधिकारियों के रसूख और अफसरशाही के प्रति मोह, निष्पक्ष जांच और न्याय पर मंडरा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल प्रदेश सरकार की उस “जीरो टॉलरेंस” पॉलिसी पर भी खड़ा है जिसमें “सख्त निर्णय” और “त्वरित न्याय” का खोखलापन उस हकीकत के रूप में नजर आता है जिसमें नगर की सरकार घटना के करीब दो हफ्ते बाद भी पीने को साफ पानी नहीं दे सकी।