वे वकील हैं—
संविधान उनके लिए
कोई सजावटी किताब नहीं,
बल्कि पाठ्यक्रम रह चुका है।
इसीलिए जब वे कहते हैं—
“अधिकारी मेरी नहीं सुनते”
तो यह कोई भावुक बयान नहीं,
एक विधिक स्वीकारोक्ति है।
पर यही स्वीकारोक्ति
सबसे बड़ा प्रश्न भी खड़ा करती है—
तो फिर आप महापौर क्यों हैं?
जिस पद पर बैठकर
आप न आदेश चलवा पा रहे हैं,
न अन्याय रोक पा रहे हैं,
न अपने ही प्रशासन पर
नियंत्रण रख पा रहे हैं—
उस पद पर टिके रहना
सेवा नहीं, मोह है।
महापौर साहब जानते हैं—
गलत क्या है,
अन्याय कहाँ है,
और दोष किसका है।
लेकिन वे यह भी जानते हैं
कि गलत को गलत कहना
कभी-कभी
राजनीतिक आत्महत्या हो सकती है।
इसलिए वे अधिवक्ता होकर
न्याय की पैरवी नहीं करते,
बल्कि मौन का अनुबंध करते हैं।
शहर में गड्ढे हैं,
पानी गंदा है,
करोड़ों के काम अधूरे हैं—
पर महापौर का सबसे बड़ा संकट
अब भी कुर्सी ही है।
वे कहते हैं—
“मैं चाहता हूँ,
पर अधिकारी नहीं मानते।”
यह वाक्य
किसी मज़बूर नागरिक के लिए शोभा देता है,
किसी निर्वाचित मुखिया के लिए नहीं।
यदि अधिकारी नहीं सुनते,
तो या तो आप
अक्षम महापौर हैं,
या फिर
आकाओं की कृपा पर जीवित नेता।
दोनों ही स्थितियों में
नैतिक समाधान एक ही होता है—
इस्तीफ़ा।
पर इस्तीफ़ा
केवल काग़ज़ पर नहीं,
सत्ता के मोह से दिया जाता है।
और मोह यहाँ
कुर्सी से इतना गहरा है
कि हर अन्याय
“जांच चल रही है” में
दफ़न कर दिया जाता है।
महापौर साहब का कानून
अब अदालतों में नहीं,
प्रेस कॉन्फ़्रेंस में चलता है।
जहाँ हर सवाल का उत्तर
एक वाक्य में सिमट जाता है—
“देख रहे हैं…”
पर शहर देख रहा है—
कि जो सब जानते हुए भी
कुछ नहीं करता,
वह अज्ञानी नहीं,
सुविधाभोगी होता है।
इतिहास उन नेताओं को नहीं बख्शता
जो कहते हैं—
“हम चाहते थे…”
इतिहास पूछता है—
“तो फिर किया क्यों नहीं?”
और उससे भी कठोर प्रश्न यह—
“जब कुछ कर नहीं सकते थे,
तब पद छोड़ा क्यों नहीं?”
लोकतंत्र में
सबसे बड़ा अपराध
गलती करना नहीं,
गलती स्वीकार कर
फिर भी कुर्सी से चिपके रहना है।
और यही वह प्रश्न है
जिसका उत्तर
आज महापौर को देना है—
न वकील की तरह,
न नेता की तरह,
बल्कि एक नैतिक व्यक्ति की तरह।
(लेखक)
– एडवोकेट चंचल गुप्ता
