जान की कीमत में “मनमर्जी का खेल” 

मृतकों के मुआवजे में मंडराती सरकार की मौकापरस्ती 

भागीरथपुरा ‘‘जल कांड’’ ने देश भर में स्थानीय सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नाम पर कालिख पोत दी। मरने वाले लोगों के परिजनों को दो-दो लाख रुपए प्रदेश सरकार ने देकर इतिश्री कर ली और डेढ़- डेढ़ लाख रुपए के चेक राहुल गांधी की टीम ने थमा दिए। मृतकों के परिजनों को दी जाने वाली राशि जख्मों पर नमक साबित होती है जब इसमें मनमर्जी की जाती है। मनमर्जी जान की कीमत आंकने को लेकर होती है क्योंकि जिसकी जितनी मर्जी होती है, चुटकी भर मुआवजा दे दिया जाता है। किसी की जिंदगी का मुआवजा तय करने का कोई आदर्श सिस्टम नहीं है। अगर यह मौत चुनावी मौसम में होती तो हर जान की कीमत एक करोड़ रुपए तक लगाई जा सकती थी, जैसा पहले आदिवासी नागरिक की मौत के मामले में हो चुका है। 

हाल ही में हुए जल कांड ने सरकार के गरजीले स्वभाव की पोल खोल दी है। यानी सरकार की गरज हो तो किसी भी जान की कीमत करोड़ों में हो सकती है, जबकि चुनाव न हो या कोई दूसरा स्वार्थ न हो तो एक-दो लाख मिल जाए तो बड़ी बात है। 

ऐसे कई उदाहरण है जब सरकार ने मरने वालों की जान की कीमत मौका देखकर तय की या फिर यह देखकर कि मरने वाले किस क्षेत्र या कार्यक्रम, किस नेता या किस विधानसभा अथवा लोकसभा क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। अगर नेता बड़ा या मौका बड़ा तो जान की कीमत भी बड़ी। जैसा अमित शाह की चुनौवी रैली से लौटने वाले लोगों की मौत के समय हुआ था। उनकी जान की कीमत 10 लाख रुपए लगाई गई थी। यही नहीं चुनावी मौसम में आदिवासी नागरिक की मौत पर कमलनाथ सरकार ने दबाव, प्रभाव के लिए एक मृतक के परिजन को एक करोड़ रुपए की घोषणा की, वहीं इंदौर में बालेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर में 2023 में हुए हादसे में जो 36 लोग मौत के मुंह में समा गए, उनके परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए दिए गए। 

इस तरह हर मौके पर सरकार ने अलग-अलग मुआवजा बांटा, जो कि कई तरह के सवाल भी खड़े करता है। कानून के जानकार इसे सरकार की “मौकापरस्ती” भी कहते हैं। इंदौर के अधिकवक्ता चंचल गुप्ता ने इसे लेकर एक पीआईएल भी लगाई थी। मौका था 2023 के बावड़ी कांड का। इसमें मामला उठाया गया था कि “किस आधार पर कितना मुआवजा दिया जा रहा है, इसका कोई पैरामीटर या आधार नहीं है।” जबकि इसका कायदा मृतक की मौजूदा परिस्थिति, भावी संभावनाओं, उस पर परिवार की निर्भरता और तमाम स्थितियों को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए। अधिवक्ता का यह ज्वलंत विचार और मुद्दा दोनों ही कई दिनों तक चर्चा में रहा, लेकिन उचित मुकाम तक नहीं पहुंच पाया। 

इसी तरह, इससे पहले और बाद में भी मुआवजा समीकरण कटघरे में रहे हैं, लेकिन सरकार का सरकार कौन? जो सरकार कर दे वो सही। जितना बड़ा मौका होता है, उतना बड़ा मुआवजा . . . चाहे मरने वाला कोई भी हो ? या फिर मुआवजा इस पर भी निर्भर कर सकता है कि मरने वाला कौन है, चाहे मौका कोई भी हो . . . .? 

जय हिंद, जय भारत । 

 

  

 

 

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