कानून के कटघरे में “सत्ता की चुप्पी”

“अंधा बांटे रेवड़ी फिर – फिर अपनों को दे” मध्यप्रदेश सरकार के लिए इस तरह की कहावतें, बिलकुल सही साबित होती दिखाई दे रही है। इसका मतलब यह है कि “जब किसी ऐसे व्यक्ति के पास अधिकार या सत्ता (शक्ति) आ जाती है जो पक्षपाती है, तो वह केवल अपने रिश्तेदारों, मित्रों या जान-पहचान वालों को ही लाभ पहुंचाता है।”

 यह किस संदर्भ में है यह भी जान लीजिए –  मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह द्वारा कर्नल सोफिया कुरैशी पर टिप्पणी करने का मामला तो आपको याद ही होगा। भरे सभागार में मंत्री द्वारा महिला कर्नल के लिए जो टिप्पणी की गई थी, उस पर हाई कोर्ट ने संज्ञान लेकर एफआईआर के आदेश दिए और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। 

बात यहीं पर खत्म नहीं होती, दरअसल मंत्री लोक सेवक (जिन्हें वास्तव में जनता की सेवा के लिए जिम्मेदारी और संवैधानिक अधिकार दिए होते हैं) की श्रेणी में आते हैं और उन पर केस चलाने के लिए उक्त राज्य के राज्यपाल से एक विशेष स्वीकृति चाहिए होती है, जिसे अभियोजन की स्वीकृति कहा जाता है। हैरत है कि सरकार की ओर से अभियोजन स्वीकृति में मामला लटका दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाकर दो हफ्ते का समय दिया है। यह हालत तब है जब देश के लिए जान न्योछावर करने वाली सैन्यकर्मी के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी करने वाले मंत्री के प्रति “सॉफ्ट कॉर्नर” बरता जा रहा है। 

अंदाजा लगाइए कि “सुशासन” और “सबको न्याय” जैसे जुमलों की हकीकत हमारे राज्य और देश में क्या है? अगर कोई सामान्य महिला होती तो उसे तो अब तक तिनके की तरह उड़ा दिया गया होता। (अक्षरशः वास्तव में भी)

मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती केवल एक व्यक्ति विशेष से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह उस प्रवृत्ति पर गंभीर टिप्पणी है जिसमें सत्ता के संरक्षण में कानून को लंबित रखने की कोशिश की जाती है। “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी ने जिस संवैधानिक बहस को जन्म दिया, वह अब न्यायपालिका और कार्यपालिका के टकराव के रूप में सामने है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहना कि राज्य सरकार दो सप्ताह में अभियोजन की मंजूरी पर निर्णय करे, दरअसल कानूनी प्रक्रिया में की गई राजनीतिक देरी पर फटकार है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 का उद्देश्य ईमानदार लोक सेवकों को निराधार मुकदमों से बचाना है, न कि राजनीतिक पद धारकों को जवाबदेही से मुक्त करना। जब प्रथम दृष्टया अपराध स्थापित हो चुका हो और जांच एजेंसी अपनी प्रक्रिया पूरी कर चुकी हो, तब सैंक्शन को टालना कानून की मंशा का उल्लंघन है।

यह भी चिंताजनक है कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा सेना की महिला अधिकारी पर की गई टिप्पणी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आवरण में ढकने का प्रयास किया गया। सुप्रीम कोर्ट का माफीनामे को सिरे से खारिज करना यह स्पष्ट करता है कि माफी तब अर्थपूर्ण होती है जब वह समय पर और स्वेच्छा से दी जाए, न कि न्यायिक दबाव में।

यह मामला केवल एक मंत्री की टिप्पणी तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है कि क्या राजनीतिक सत्ता जांच और अभियोजन को नियंत्रित करने का औजार बन चुकी है। अभियोजन स्वीकृति में देरी न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करती है और यह संदेश देती है कि सत्ता के निकट होने से कानून की गति धीमी हो सकती है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान लेना और बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसआईटी गठित करना इस बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका ने संवैधानिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। यदि सरकार समय सीमा के भीतर निर्णय नहीं लेती, तो यह न केवल न्यायालय की अवमानना की स्थिति पैदा करेगा, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

लोकतंत्र में मंत्री पद किसी को विशेषाधिकार नहीं देता, बल्कि अधिक उत्तरदायित्व सौंपता है। कानून का सम्मान केवल आम नागरिक से अपेक्षित नहीं है; सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह अपेक्षा और भी कठोर होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती एक चेतावनी है कि “कानून मौन नहीं रहता, जब सत्ता उसे टालने की कोशिश करती है।”

जाहिर है जिनके पास अधिकार है, उन्हें इसका इतना भी दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, इतनी भी अति नहीं करना चाहिए कि अधिकार देने वाले लोग अपने ही चयन को गलत मान लें और ठान लें कि “अबकी बार, गलती सुधार।” 

लेखक : एडवोकेट चंचल गुप्ता

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